पृष्ठभूमि

      संविधान सभा द्वारा स्वतंत्र भारत के लिए एक नए संविधान का प्रारूप तैयार करने का कार्य आरम्भ किए जाने के बाद ग्रंथालय की स्थापना करने की मांग जोर पकड़ने लगी और इसके अनुसरण में एक स्वतंत्र और व्यापक ग्रंथालय सेवा की परिकल्पना की गई।  वर्ष 1950, जब भारत एक संप्रभु, लोकतात्रिक गणराज्य बना, उस समय मात्रात्मक और गुणात्मक, दोनों ही तरह से संसदीय ग्रंथालय के संग्रह में व्यवस्थित रुप से वृद्धि हुई।  पुस्तकों की खरीद करके और भारत तथा विदेशों में विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ आदान-प्रदान व्यवस्था के आधार पर ग्रंथालय को और सुदृढ़ बनाने के लिए 1950-55 के दौरान सामूहिक प्रयास किए गए।  शीघ्र ही, "संसद ग्रंथालय" यू.एन. प्रकाशनों और उसकी संबद्ध एजेंसियों के लिए एक संग्रह ग्रंथालय बन गया और यू.के. के कमांड पत्र और संयुक्त राज्य अमरीका और अनेक अन्य देशों से सरकारी प्रकाशन यहाँ प्राप्त होने लगे। सदस्यों को प्रदान की गई विभिन्न सेवाओं को और सुदृढ़ बनाने के दृष्टिगत इस विस्तार के परिणामस्वरूप वर्ष 1956 और उसके बाद 1966 और पुनः दिसंबर 1974 में ग्रंथालय के पुनर्गठन की आवश्यकता महसूस हुई। 

संसद ग्रंथालय तथा सन्दर्भ, शोध, प्रलेखन और सूचना सेवा (लार्डिस)

      गत छह दशकों के दौरान संसद सदस्यों हेतु ग्रंथालय तथा तत्संबधी सेवाएं भी धीरे-धीरे विकसित हुई हैं जिन्हे संसद ग्रंथालय तथा संदर्भ - शोध प्रलेखन और सूचना सेवा और अधिक प्रचलित लार्डिस नाम से जाना जाता है।  एकीकृत सेवा का वर्तमान ढांचा और नाम वर्ष 1974-75 में लोक सभा तथा राज्य सभा सचिवालयों का बड़े पैमाने पर कार्यात्मक पुनर्गठन किए जाने के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया।